उजाला टुडे संवाददाता:- संजय सोनपिपरे कोंडागांव 9479008457
कोंडागांव कलेक्टोरेट में “नींद-प्रशासन”: जनता बाहर बेहाल, अपर कलेक्टर साहब टेबल पर निहाल!

कोंडागांव, (23 मई, 2025): कोंडागांव का सरकारी दफ्तर अब ‘कामकाज’ के लिए कम और ‘आरामगाह’ के लिए ज्यादा जाना जाने लगा है! एक बार फिर, जिले के अपर कलेक्टर डी. आर. ठाकुर ने सरकारी कार्यप्रणाली की धज्जियां उड़ाते हुए, वर्किंग आवर्स में अपने दफ्तर की टेबल पर गहरी नींद में खर्राटे भरते हुए पकड़े गए हैं। दोपहर के ठीक 12:30 बजे का समय था, जब जनता अपनी फरियाद लेकर उनके केबिन के बाहर घंटों इंतजार कर रही थी, लेकिन साहब अपने आरामदायक आसन पर लात फैलाकर सोते हुए कैमरे में कैद हो गए। यह शर्मनाक वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, और जनता के बीच भारी आक्रोश है।
“सुशासन” की जगह “सुषुप्त शासन”?
यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की लापरवाही नहीं, बल्कि कोंडागांव में सरकारी दफ्तरों की बिगड़ती कार्यसंस्कृति का जीता-जागता प्रमाण है। कुछ ही दिन पहले, 15 मई को माकड़ी ब्लॉक के रांधना में आयोजित ‘सुशासन तिहार’ कार्यक्रम के दौरान, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आर.के. सिंह भी मंच के पास ही सोते हुए पाए गए थे, जब प्रभारी मंत्री और विधायक जनता को संबोधित कर रहे थे। ये वाकये साबित करते हैं कि जहां सरकार सप्ताह में पांच दिन के दफ्तर और सुबह 10 से शाम 5:30 बजे तक के कार्यकाल की व्यवस्था सरकारी कर्मचारियों को राहत और उत्साह देने के लिए करती है, वहीं कुछ अधिकारी इसे अपनी निजी “आरामगाह” समझने लगे हैं।
क्या पूर्व कलेक्टर की सख्ती भूले वर्तमान साहब?
यह भी याद दिलाना जरूरी है कि ऐसे मामलों में पहले सख्त कार्रवाई हुई है। तत्कालीन कलेक्टर कुणाल दुदावत ने तो समय-सीमा की बैठक में सोते पाए गए विश्रामपुरी जनपद पंचायत के सीईओ जी. एल. चुरेंद्र को न केवल तुरंत मीटिंग से बाहर निकाला था, बल्कि मौके पर ही निलंबित भी कर दिया था। उस कार्रवाई ने एक मजबूत संदेश दिया था कि लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अब सवाल यह है कि क्या वर्तमान कलेक्टर भी उसी कदम से कदम मिलाएंगे? या फिर इस तरह के ढुलमुल और गैर-जिम्मेदार रवैये को शह देकर सरकारी दफ्तरों में ‘वीआईपी नींद’ का सिलसिला जारी रहने देंगे? कोंडागांव की जनता को उम्मीद है कि इस मामले में तत्काल और कठोर कार्रवाई होगी, ताकि जनता का सरकारी व्यवस्था में विश्वास बहाल हो सके और अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाना सीखें।
क्या आपको लगता है कि ऐसे अधिकारियों पर सिर्फ निलंबन ही काफी है, या कोई और कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए?
