संजय सोनपिपरे संपादक, उजाला टुडे कोंडागांव
कोंडागांव: ‘हरा सोना’ लूटने का संगठित अपराध! वन विभाग नहीं, यह तो ‘लकड़ी तस्करों का कॉर्पोरेट’ है
एक्सक्लूसिव इन्वेस्टिगेशन: लाखों की लकड़ी कटी, सरकारी ट्रक में ढोई गई और डीएफओ बोले- ‘मुझे पता ही नहीं’!
उजाला टुडे कोंडागांव 28 अक्टूबर 2025- कोंडागांव वन मंडल के जंगल अब केवल ‘जंगलराज’ के शिकार नहीं हैं, बल्कि यह ‘संगठित अपराध’ का एक नया केंद्र बन चुके हैं। यहाँ ‘हरा सोना’ (कीमती लकड़ी) की लूट इतनी संगठित और बेखौफ हो चुकी है कि निचले स्तर के अधिकारी—डिप्टी रेंजर और बीटगार्ड—खुद को एक समानांतर सत्ता मानते हैं। जो रिपोर्ट सामने आई है, वह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि उच्च अधिकारियों की सक्रिय मिलीभगत या जानबूझकर आँखें मूँदने की तरफ इशारा करती है।
सवाल एक: क्या वन विभाग ‘वन माफियाओं’ की सहायक कंपनी बन गया है?
जिस तरह से ये दो मामले सामने आए हैं, वे दिखाते हैं कि यह कोई इक्का-दुक्का चोरी नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित सप्लाई चेन है, जिसमें नियमों को बाईपास करने के लिए हर स्तर पर ‘फीस’ तय है:
- कमेला
- दहीकोंगा की साजिश: कमेला ग्राम पंचायत के ऑरेंज एरिया 498 में ‘कूप कटाई’ के नाम पर हरे पेड़ों को काटा गया। सबसे बड़ा झूठ यह है कि वन प्रबंधन समिति को पता ही नहीं चला! सवाल यह है कि बीटगार्ड या डिप्टी रेंजर को समिति की मुहर और फर्जी प्रस्ताव बनाने की ‘खुली छूट’ किसने दी? क्या रेंजर विजनलाल शर्मा को सच में नहीं पता, या उन्होंने ‘पता न होने’ का नाटक करके खुद को जाँच से बाहर कर लिया?
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- ग्रामीणों का आरोप: जब जीते-जागते पेड़ों को काटा जा रहा था, तब स्थानीय वन प्रबंधन समिति को अंधेरे में क्यों रखा गया? यह सीधे तौर पर ग्राम सभा की शक्ति का उल्लंघन है।
- नारंगी का ‘सरकारी’ परिवहन घोटाला: नारंगी परिक्षेत्र में तो हद ही हो गई। यहाँ फर्जी प्रस्ताव पर अकेसिया के सैकड़ों पेड़ काटे गए और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि तस्करी के लिए सरकारी ट्रकों का इस्तेमाल हुआ।
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- क्रिमिनल कनेक्शन: सूत्रों के अनुसार, परिक्षेत्र अधिकारी ने तस्कर से सीधा ‘डील’ कर न केवल काटने की अनुमति दी, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि सरकारी डिपो जाने वाली लकड़ी सीधे कोंडागांव के रामलाल देवांगन सॉ मिल पहुँचे।
- सवाल: सरकारी ट्रक और सरकारी लॉग बुक में यह हेरफेर किसकी सहमति से हुआ? क्या परिवहन अधिकारी और डिपो इंचार्ज इस “डील” का हिस्सा नहीं थे?
व्यवस्था पर दाग: ‘मुझे पता नहीं’ कहकर बच नहीं सकते डीएफओ-रेंजर
यह कहना कि ‘मुझे पता नहीं’ अब केवल बहाना नहीं, बल्कि अपने पद की जिम्मेदारी से भागने का कानूनी अपराध है। लाखों की लकड़ी कटती है, सरकारी ट्रक में लोड होती है और सॉ मिल तक जाती है, और डीएफओ चूड़ामणी सिंह कहते हैं कि उन्हें कोई भनक नहीं!
- व्यवस्थागत विफलता : वन विभाग में एक चेन ऑफ कमांड होती है। यदि निचले स्तर का एक बीटगार्ड अपने रेंजर को रिपोर्ट नहीं कर रहा है, और रेंजर डीएफओ को, तो इसका सीधा मतलब है कि यह चेन भंग नहीं हुई है, बल्कि इसे भ्रष्टाचार के लिए जानबूझकर ‘रोक’ दिया गया है।
- दबाब बनाम दिखावा: मीडिया के दखल के बाद मिल से लकड़ी वापस डिपो भेजना कोई कार्रवाई नहीं, बल्कि मामले को शांत करने का असफल प्रयास है।
अब जरूरत है कि इस पूरे नेटवर्क की जांच की जाए: केवल बीटगार्ड या डिप्टी रेंजर पर कार्रवाई करना ‘छोटी मछली’ पकड़ना होगा। डीएफओ चूड़ामणी सिंह को यह साबित करना होगा कि यह जंगलराज उनकी नाक के नीचे उनकी सक्रियता से नहीं चल रहा था। उन्हें तत्काल प्रभाव से दहीकोंगा और नारंगी के रेंज अधिकारियों को निलंबित कर, एक विशेष जाँच दल (SIT) गठित करना चाहिए।
(अगर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो कोंडागांव के जंगल जल्द ही केवल कागजों पर बचेंगे, जमीन पर सिर्फ कटे हुए ठूँठ और वन माफियाओं का साम्राज्य होगा।)




