संजय सोनपिपरे संपादक, उजाला टुडे कोंडागांव
विशेष रिपोर्ट: ‘सूर्य घर’ का दरवाज़ा ग़रीबों के लिए बंद? – कच्चे मकान, बिना पट्टा और ₹75,000 करोड़ की योजना का सच!
पीएम सूर्य घर योजना: बिजली बिल से मुक्ति का सपना टूटा! जिस गरीब के लिए बनी योजना, वही छत की वजह से बाहर?
उजाला टुडे कोंडागांव 10 दिसम्बर 2025-: केंद्र सरकार ने ‘प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना’ को एक करोड़ परिवारों तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। ₹75,000 करोड़ की लागत वाली यह योजना गरीबों और निम्न-आय वर्ग को हर महीने 300 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा करती है। यह वादा, बिजली के बढ़ते बिलों से जूझ रहे लाखों गरीब परिवारों के लिए उम्मीद की एक किरण था।
मगर, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयाँ कर रही है। देश के लाखों ग्रामीण और शहरी गरीब, जो कच्चे खपरैल (टाइल) वाले घरों में या बिना कानूनी ‘पट्टा’ (स्वामित्व प्रमाण पत्र) वाले मकानों में रहते हैं, वे इस योजना का लाभ लेने से वंचित हो रहे हैं। यह स्थिति एक गंभीर सवाल खड़ा करती है: जिस गरीब के लिए यह योजना बनी है, वही नियमों के जंजाल में क्यों फँस रहा है?
नियमों की दीवार: गरीबों के हक पर ताला
योजना के क्रियान्वयन में दो मुख्य शर्तें सबसे बड़ी बाधा बन रही हैं:
छत की ‘तकनीकी मजबूती’: सोलर पैनल लगाने के लिए वेंडर या बिजली वितरण कंपनियाँ ऐसी छत चाहती हैं जो पैनल के वजन और संरचनात्मक तनाव को सह सके। कच्चे, मिट्टी के या खपरैल के मकानों की छतें इस तकनीकी मानदंड पर खरी नहीं उतरतीं। सुरक्षा और स्थिरता का हवाला देकर, इन आवेदनों को खारिज किया जा रहा है।
स्वामित्व का कानूनी प्रमाण (पट्टा): आवेदन के लिए घर के स्वामित्व का कानूनी दस्तावेज (पट्टा, रजिस्ट्री, आदि) अक्सर अनिवार्य होता है। झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले या गाँव में पुरखों की जमीन पर बिना कानूनी कागजात के रह रहे लाखों गरीब परिवारों के पास यह दस्तावेज़ नहीं है।
सवाल: एक तरफ सरकार कहती है कि यह योजना गरीब परिवारों की बिजली बिल की दरें कम करके उनकी गरीबी दूर करेगी, दूसरी तरफ उसके अपने नियम गरीब की हकीकत (कच्चा मकान और पट्टे का अभाव) को नकार रहे हैं। अगर योजना गरीब के लिए है, तो नियम अमीर के मकान के क्यों?

गरीबों की आवाज: ‘सरकार क्यों करती है झूठा वादा?’
नाम न छापने की शर्त पर, एक ग्रामीण लाभार्थी ने अपनी पीड़ा व्यक्त की, “मेरे पास हर महीने ₹1500 का बिल आता है। सरकार ने कहा कि 300 यूनिट मुफ्त मिलेगी, लेकिन जब हमने आवेदन किया तो कहा गया कि ‘छत कच्ची है, पैनल नहीं लग सकता’। अगर हमारा कच्चा मकान है और पट्टा नहीं है, तो क्या हम इस देश के नागरिक नहीं हैं? अगर हमें ही लाभ नहीं देना है, तो सरकार क्यों कहती है कि यह योजना गरीब के लिए है? क्या गरीबी दूर करने का मतलब सिर्फ़ शहरों में पक्के मकान वालों को लाभ देना है?”
सरकार को सोचना होगा: ये कैसी ‘समावेशी’ योजना?
गरीबों के हितों की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सरकार को तत्काल निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए:
कच्चे मकानों के लिए विशेष इंजीनियरिंग समाधान: सरकार को तत्काल हल्के, टिकाऊ और कम वजन वाले सोलर स्ट्रक्चर डिज़ाइन विकसित करने के लिए विशेषज्ञों को शामिल करना चाहिए, जो कच्चे मकानों की छतों पर सुरक्षित रूप से लगाए जा सकें।
स्वामित्व प्रमाण पत्र में सरलीकरण: ‘पट्टा’ न होने की स्थिति में, स्थानीय ग्राम पंचायत, पटवारी या नगर निगम द्वारा जारी एक सरल ‘रिहायशी प्रमाण पत्र’ को मान्य किया जाए। बिजली कनेक्शन का बिल या आधार कार्ड को ही स्वामित्व का प्राथमिक प्रमाण माना जाए।
निष्कर्ष: यदि सरकार वास्तव में चाहती है कि ₹75,000 करोड़ की यह योजना गरीबों के जीवन में बदलाव लाए और उनके बिजली बिल का बोझ कम करे, तो उसे अपने ही बनाए तकनीकी और कानूनी अवरोधों को तोड़ना होगा। जब तक इन नियमों को गरीबों की वास्तविक स्थिति के अनुरूप नहीं ढाला जाता, तब तक यह योजना केवल मध्यम वर्ग तक सीमित रहेगी, और सबसे जरूरतमंद तबका दूर खड़ा होकर सरकार के वादों पर सवाल उठाता रहेगा।

