संजय सोनपिपरे संपादक, उजाला टुडे कोंडागांव
एक चपरासी के हाथों जिला पंचायत की बागडोर: सांसद की अनुशंसा भी बेअसर, रसूख के आगे नियम बौने!
उजाला टुडे कोंडागांव 19 जनवरी 2026- कोंडागांव: क्या किसी जिले की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक संस्था ‘जिला पंचायत’ को एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नियंत्रित कर सकता है? कोंडागांव में तो हालात यही बयां कर रहे हैं। यहाँ सुशासन के दावों के बीच एक भृत्य (चपरासी) का ‘समानांतर शासन’ चल रहा है। आलम यह है कि बस्तर सांसद की लिखित अनुशंसा भी इस कर्मचारी के रसूख के आगे एक रद्दी के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं साबित हो रही।
10 साल से ‘अघोषित सत्ता’, फाइलों पर खीरराम का कब्जा
पूरा मामला आदिवासी विकास शाखा के भृत्य खीरराम नेताम से जुड़ा है। जिनकी मूल नियुक्ति ‘पिछड़ा वर्ग बालक छात्रावास’ में है, लेकिन वे पिछले 10 वर्षों से जिला पंचायत की स्थापना शाखा में कुंडली मारकर बैठे हैं। चर्चा है कि यहाँ अधिकारियों की कलम चलने से पहले खीरराम की ‘हरी झंडी’ जरूरी होती है।
सांसद ने लिखा पत्र, पर ‘सियासी आकाओं’ के फोन ने रोका रास्ता
बस्तर सांसद महेश कश्यप ने इस विसंगति को देखते हुए खीरराम नेताम को उनकी मूल संस्था भेजने के कड़े निर्देश दिए थे। प्रशासन ने फाइल भी आगे बढ़ाई, लेकिन सूत्रों का कहना है कि जैसे ही आदेश जारी होने का वक्त आता है, ‘ऊपर’ से रसूखदार नेताओं के फोन घनघनाने लगते हैं। एक अदना सा कर्मचारी आज जिले के प्रशासनिक तंत्र और जन-प्रतिनिधियों के आदेशों के बीच दीवार बनकर खड़ा है।
राजनीतिक संरक्षण और नियम विरुद्ध कार्यप्रणाली
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि खीरराम नेताम ने सरकारी सेवक होने के बावजूद विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी का खुलकर राजनीतिक प्रचार किया। सेवा नियमों की धज्जियां उड़ाने के बाद भी उन पर कार्रवाई न होना जिला प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
- सवाल 1: क्या स्थापना शाखा जैसे संवेदनशील विभाग की बागडोर एक अटैचमेंट वाले भृत्य को देना उचित है?
- सवाल 2: शासन के ‘संलग्नीकरण समाप्ति’ के आदेश का पालन कोंडागांव में क्यों नहीं हो रहा?
- सवाल 3: क्या जिला प्रशासन ने सांसद के आदेशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है?
जनता की नजर अब कार्रवाई पर
एक ओर राज्य सरकार भ्रष्टाचार और अनियमितता पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की बात करती है, वहीं कोंडागांव जिला पंचायत में चल रहा यह ‘भृत्यराज’ सरकार की छवि धूमिल कर रहा है। अब देखना यह है कि जिला कलेक्टर,जिला पंचायत सीईओ इस ‘अघोषित कब्जे’ को हटाते हैं या चपरासी की ‘नेतागिरी’ प्रशासन पर यूँ ही भारी पड़ती रहेगी।


