संपादक, संजय सोनपिपरे उजाला टुडे कोंडागांव
विशेष रिपोर्ट: प्यास से कराहता बोथा, अंधेरे में डूबी उम्मीदें—एक महीने में चार बार जला ट्रांसफार्मर
उजाला टुडे कोंडागांव 29 अप्रैल 2026- कोंडागांव: विकास के दावों के बीच बस्तर के गांवों से जो तस्वीरें निकलकर आ रही हैं, वे दिल दहला देने वाली हैं। कोंडागांव जिले के ग्राम पंचायत तोरण्ड के आश्रित ग्राम बोथा (खासपारा) में आज मानवता प्यासी है और उम्मीदें अंधेरे में। यहाँ बिजली के अभाव ने न केवल घरों की रोशनी छीनी है, बल्कि ग्रामीणों को ‘झरिया’ का गंदा पानी पीने पर मजबूर कर दिया है।
त्रासदी के आंकड़े: 1 महीना, 4 बार खराब हुआ ट्रांसफार्मर
बोथा गांव की बर्बादी की कहानी पिछले एक महीने से लिखी जा रही है। गांव में लगा 25 KV का ट्रांसफार्मर अब तक चार बार जल चुका है। जैसे ही बिजली विभाग इसे सुधारता है, कुछ ही घंटों में यह फिर जवाब दे देता है।
”हमें रोशनी नहीं, अब तो बस प्यास बुझाने के लिए बिजली चाहिए।” — बदहवास ग्रामीण
खेत सूखे, गले प्यासे: ‘झरिया’ बना एकमात्र सहारा
बिजली गुल होने का असर केवल अंधेरे तक सीमित नहीं है। इसका सबसे भयावह रूप जल संकट के तौर पर सामने आया है:
- फसलों की बर्बादी: सिंचाई पंप ठप होने से लहलहाती फसलें सूखकर पीली पड़ गई हैं। किसानों की मेहनत और पूंजी मिट्टी में मिल रही है।
- पानी के लिए जद्दोजहद: गांव के करीब 80 परिवारों (लगभग 500 लोग) के सामने पीने के पानी का संकट खड़ा हो गया है।
- आदिम संघर्ष: ग्रामीण सूखी नदी की रेत खोदकर, उसमें बांस की टोकरियां गाड़ रहे हैं। घंटों इंतजार के बाद जो पानी रिसकर जमा होता है (झरिया पानी), उसी से ग्रामीण अपनी प्यास बुझा रहे हैं। यह दूषित पानी बीमारियों को खुला निमंत्रण दे रहा है।
प्रशासन से गुहार: 63 KV की मांग
ग्रामीणों ने अपनी इस दयनीय स्थिति का वीडियो बनाकर जिला प्रशासन और कलेक्टर कोण्डागांव तक पहुंचाया है। ग्रामीणों की मांग स्पष्ट और तार्किक है:
- बार-बार जल रहे 25 KV के ट्रांसफार्मर को हटाकर 63 KV का क्षमता वाला नया ट्रांसफार्मर लगाया जाए।
- गांव में पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था तुरंत सुनिश्चित की जाए।
यह सिर्फ तकनीकी खराबी का मामला नहीं है, बल्कि एक पूरे गांव के अस्तित्व का सवाल है। जब खेत सूख रहे हों और लोग रेत खोदकर पानी पीने को मजबूर हों, तब शासन की त्वरित प्रतिक्रिया ही एकमात्र उम्मीद बचती है। क्या प्रशासन बोथा की इस ‘प्यास’ और ‘पीड़ा’ को समझेगा?
