बरकई में 3 साल बाद फिर सजेगा ‘बंधा मातौर’ का महापर्व: 23 मई को तालाब में उतरेंगे हजारों लोग
- ओडिशा के मेहमान भी होंगे शामिल, हाथ से मछली पकड़ने वालों को मिलेगी निःशुल्क एंट्री
- 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के तालाब में उतरने पर रहेगा प्रतिबंध
उजाला टुडे कोंडागांव 21 मई 2026-कोंडागांव:छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले के ग्राम बरकई में इस शनिवार, 23 मई 2026 को भव्य ‘बंधा मातौर तालाब महोत्सव’ का आयोजन होने जा रहा है। तीन साल के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर इस ऐतिहासिक लोक परंपरा को जीवंत किया जाएगा। जिले भर के हजारों लोग इस अनूठे सामूहिक मछली पकड़ने के उत्सव में एकजुट होकर बस्तरिया संस्कृति का जश्न मनाएंगे।
क्या है बंधा मातौर और इसकी महत्ता?
यह छत्तीसगढ़ के बस्तर-कोंडागांव अंचल की एक अत्यंत प्राचीन और अनूठी आदिवासी परंपरा है, जो “गांव का तालाब — गांव का उत्सव” की सामूहिक भावना पर आधारित है। बरकई गांव में प्रतिवर्ष मार्च-अप्रैल के दौरान यहाँ के प्रमुख देव भंगाराम के सम्मान में मड़ई का आयोजन होता है। इस मड़ई का प्रभाव आसपास के बारह गांवों तक फैला है, इसीलिए इसे “बरहपाली की मड़ई” भी कहा जाता है। इसी मड़ई उत्सव के समापन या विस्तार के रूप में इस तालाब महोत्सव यानी ‘बंधा मातौर’ का आयोजन होता है, जिसमें सभी जातियों और समुदायों के लोग बिना किसी भेदभाव के एकसाथ तालाब में उतरकर मछलियाँ पकड़ते हैं।
प्रवेश शुल्क और सुरक्षा के नियम
आयोजक समिति के सदस्य मिलन कुमार पाण्डे ने बताया कि इस कार्यक्रम में कोंडागांव जिले के किसी भी गांव का नागरिक भाग ले सकता है। उत्सव को व्यवस्थित रखने के लिए कुछ नियम और शुल्क तय किए गए हैं:
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- प्रवेश शुल्क: ₹200 से शुरू (मछली पकड़ने के साधन और उपकरणों जैसे जाली, सौंकी, चगोड़ी के अनुसार अलग-अलग टिकट दरें)।
- निःशुल्क प्रवेश: जो लोग बिना किसी उपकरण के, केवल अपने हाथों से मछली पकड़ना चाहते हैं, उनके लिए प्रवेश पूर्णतः निःशुल्क रहेगा।
- सुरक्षा गाइडलाइन: सुरक्षा की दृष्टि से 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों का तालाब के गहरे पानी में उतरना पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।
परंपरा का रहस्यमयी पहलू: मालगुजार की उंगली और मछलियों का खेल
इस उत्सव की सबसे रोचक और अलौकिक परंपरा मालगुजार की विशेष भूमिका से जुड़ी है। आयोजन के दौरान मालगुजार को विशेष आदर के साथ बुलाकर लाया जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, जब तालाब के किनारे एक विशेष धुन बजाई जाती है, तो मछलियाँ स्वयं ही पानी से ऊपर उछलने और छलांग लगाने लगती हैं। इसके बाद जब दो-तीन बार मछली पकड़ ली जाती है, तो मालगुजार जैसे ही अपनी उंगली पानी में डालते हैं, मछलियाँ अचानक गायब और शांत हो जाती हैं। यह अनोखा और रहस्यमयी नजारा आज भी लोगों के लिए गहरी आस्था और कौतूहल का विषय है।
दो राज्यों की साझी सांस्कृतिक भागीदारी
वर्ष 2023 में हुए पिछले आयोजन में न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पड़ोसी राज्य ओडिशा के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हुए थे। इस वर्ष भी ओडिशा के ग्रामीणों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है। तालाब के चारों ओर मनोरंजन, खान-पान और उत्सवी माहौल रहेगा, जो इसे महज मछली पकड़ने का आयोजन नहीं बल्कि दो राज्यों का एक बड़ा सांस्कृतिक महापर्व बनाता है।
बाजारवाद से दूर, जीवित है परंपरा की मूल आत्मा
आधुनिक दौर में जहाँ कई लोक परंपराएं व्यावसायिकता की भेंट चढ़ चुकी हैं, वहीं बरकई गांव की यह मड़ई और बंधा मातौर आज भी अपने पुरातन और शुद्ध स्वरूप में जीवित है। यहाँ अभी तक व्यावसायिक मनोरंजन और बाजारवाद का दखल नहीं हुआ है। यह उत्सव सामाजिक समरसता, आपसी भाईचारे और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का जीवंत प्रतीक है। आयोजक समिति ने अंचल के सभी नागरिकों से इस पारंपरिक आयोजन में बढ़-चढ़कर भाग लेने और इसे ऐतिहासिक बनाने की अपील की है।

