
संजय सोनपिपरे संपादक, उजाला टुडे कोंडागांव
आयुध पूजा 2025: विजयदशमी पर क्यों होती है अस्त्र-शस्त्र और उपकरणों की पूजा?
आयुध पूजा 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त
उजाला टुडे 01 अक्टूबर 2025 – आयुध पूजा मुख्य रूप से महा नवमी के दिन होती है, लेकिन दशहरे (विजयदशमी) पर विजय मुहूर्त में इसे करना सबसे शुभ माना जाता है।
दशमी तिथि 01 अक्टूबर 2025 को शाम 07:01 बजे शुरू होगी और 02 अक्टूबर 2025 को शाम 07:10 बजे समाप्त होगी। शस्त्र पूजा का शुभ विजय मुहूर्त 02 अक्टूबर को दोपहर 02:09 बजे से 02:56 बजे तक रहेगा।
क्यों होती है अस्त्र-शस्त्र की पूजा? (महत्व और पौराणिक कथा)
आयुध पूजा (या शस्त्र पूजा) केवल हथियारों की पूजा नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन में आजीविका के साधनों और कौशल को सम्मान देने का पर्व है।
1. पौराणिक महत्व
- माँ दुर्गा की विजय: यह पूजा माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय के उपलक्ष्य में की जाती है। देवी ने नवमी की रात महिषासुर का वध किया था, और विजयदशमी (दसवें दिन) उनकी जीत का उत्सव है। नवमी की शाम उन शस्त्रों (आयुधों) की पूजा की जाती है, जिनका उपयोग देवी ने धर्म की रक्षा के लिए किया था।
- पांडवों की कहानी: महाभारत में, पांडवों को 12 वर्ष के वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास पर जाना पड़ा था। अज्ञातवास के दौरान, अर्जुन ने अपने सभी अस्त्र-शस्त्रों को शमी वृक्ष पर छिपा दिया था। वे विजयदशमी के दिन ही अपने शस्त्रों को वापस लेकर आए और कौरवों पर विजय प्राप्त की। इसलिए इस दिन शस्त्रों की पूजा को विजय का प्रतीक माना जाता है।
- भगवान राम की विजय: इसी दिन भगवान राम ने रावण का वध कर बुराई पर अच्छाई की जीत सुनिश्चित की थी।
2. व्यावहारिक और आध्यात्मिक महत्व
आयुध पूजा हमें सिखाती है कि हमारे जीवन में हमारे उपकरण (Tools) ही हमारी शक्ति हैं। एक सैनिक के लिए उसका शस्त्र, एक किसान के लिए उसके कृषि उपकरण, एक विद्यार्थी के लिए उसकी किताबें, और एक इंजीनियर के लिए उसके औजार—ये सभी उसके जीवन के आधार हैं।
- इस दिन हम अपने उपकरणों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
- माना जाता है कि पूजा से उन उपकरणों में नई ऊर्जा और दैवीय शक्ति का संचार होता है।
- लोग इस दिन अपने वाहनों (Vehicles), कंप्यूटर, मशीनों और पुस्तकों की भी पूजा करते हैं ताकि पूरे वर्ष वे बिना किसी बाधा के कुशलता से काम कर सकें।
आयुध पूजा (शस्त्र पूजा) की सरल विधि
आयुध पूजा को विजयादशमी के दिन विजय मुहूर्त या अपराह्न काल में किया जाना चाहिए।
1. तैयारी और शुद्धिकरण:
- सफाई: जिन भी अस्त्र-शस्त्रों, औजारों, या उपकरणों की पूजा करनी है, उन्हें अच्छी तरह से साफ करें और यदि संभव हो तो पॉलिश करें।
- स्थान: पूजा स्थान पर एक साफ लाल कपड़ा बिछाएँ और उन उपकरणों को सम्मानपूर्वक उस पर रखें।
- पवित्र करना: सभी उपकरणों पर गंगाजल या शुद्ध जल छिड़ककर उन्हें पवित्र करें।
2. पूजा अनुष्ठान:
- तिलक: अस्त्र-शस्त्रों और उपकरणों पर हल्दी, कुमकुम (रोली), और चंदन का तिलक लगाएं।
- मौली/कलावा: उपकरणों पर कलावा (मौली) बाँधें।
- पुष्प और नैवेद्य: उन पर पुष्प (फूलों की माला) और अक्षत अर्पित करें।
- दीपक और धूप: धूप और घी का दीपक जलाएँ।
- भोग: देवी माँ को मिठाई, फल और नारियल का भोग लगाएं।
3. प्रार्थना:
- मंत्र: माँ दुर्गा और भगवान विश्वकर्मा (देवताओं के वास्तुकार) का ध्यान करते हुए, अपने कार्य में सफलता, सुरक्षा, और कुशलता की प्रार्थना करें। विशेष रूप से, देवी से यह प्रार्थना करें कि वह आपको शत्रुओं (आंतरिक और बाहरी) पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दें।
- उपयोग से बचें: पूजा करने के बाद, उस दिन शस्त्रों या उपकरणों का अनावश्यक उपयोग नहीं करना चाहिए। उन्हें आराम देना चाहिए।
यह पूजा हमें स्मरण कराती है कि जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाने के लिए शक्ति (शस्त्र), ज्ञान (पुस्तक) और परिश्रम (उपकरण) सभी आवश्यक हैं।
