संपादक, संजय सोनपिपरे उजाला टुडे कोंडागांव
खास रिपोर्ट: एक शिक्षक की ‘वॉटर बेल’ ने बदली स्कूल की तस्वीर, हात्मा बना जल संरक्षण का मॉडल
उजाला टुडे कोंडागांव 18 अप्रैल 2026- कोंडागांव:बडेराजपुर जहाँ दुनिया जल संकट की आहट से सहमी है, वहीं छत्तीसगढ़ के एक सरकारी स्कूल ने उम्मीद की नई किरण दिखाई है। शासकीय हाई स्कूल हात्मा के व्याख्याता संदीप कुमार सेन के नवाचारों ने इस स्कूल को ‘वॉटर हार्वेस्टिंग’ और प्रबंधन का एक जीवंत मॉडल बना दिया है। उनके इन छोटे लेकिन प्रभावी कदमों ने छात्रों को किताबी ज्ञान से ऊपर उठाकर ‘पर्यावरण योद्धा’ बना दिया है।
💧 संरक्षण के तीन क्रांतिकारी कदम
संदीप कुमार सेन ने विद्यालय की दिनचर्या में तीन ऐसे बदलाव किए, जिन्होंने पानी की बर्बादी को शून्य के करीब ला दिया है:
- वॉटर बेल (The Hydration Alarm): स्कूल में अब सिर्फ क्लास बदलने की घंटी नहीं बजती, बल्कि ‘पानी पीने की घंटी’ भी बजती है। यह पहल बच्चों को हाइड्रेटेड रखने के साथ-साथ पानी के अनुशासित उपयोग की सीख दे रही है।
- नेकी का पात्र (Leftover Water Bank): छुट्टी के वक्त अक्सर नालियों में बह जाने वाला बोतलों का पानी अब बर्बाद नहीं होता। स्कूल के गेट पर रखे एक विशाल ‘जल पात्र’ में छात्र बचा हुआ पानी डालते हैं, जिससे स्कूल के बगीचे में लहलहाती हरियाली को जीवन मिलता है।
- नन्हे ‘जल प्रहरी’: स्कूल ने छात्रों की एक विशेष टीम गठित की है। ये जल प्रहरी स्कूल परिसर में गुप्तचरों की तरह नजर रखते हैं कि कहीं कोई नल टपक तो नहीं रहा। यह बच्चों में ‘स्वामित्व’ (Ownership) की भावना जगा रहा है।
तस्वीर बदल रही है, सोच बदल रही है
संदीप सेन के इस नेतृत्व की गूँज अब गाँव की गलियों तक पहुँच चुकी है। अभिभावकों का कहना है कि बच्चे अब घर पर भी पानी बचाने के लिए बड़ों को टोकने लगे हैं।
“हमारा उद्देश्य केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना है जो संसाधनों की कीमत समझें। ‘जल है तो कल है’ सिर्फ नारा नहीं, हमारी कार्यशैली है।”
— संदीप कुमार सेन, व्याख्याता
शिक्षाविदों की राय
विशेषज्ञों का मानना है कि हात्मा स्कूल का यह ‘लो-कॉस्ट मॉडल’ पूरे देश के सरकारी स्कूलों में लागू किया जाना चाहिए। बिना किसी भारी बजट के, केवल इच्छाशक्ति के दम पर पानी की एक-एक बूंद बचाकर इस स्कूल ने मिसाल कायम की है।
शासकीय हाई स्कूल हात्मा ने साबित कर दिया है कि अगर शिक्षक का संकल्प दृढ़ हो, तो सरकारी स्कूल भी बदलाव की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन सकते हैं।
