संपादक, संजय सोनपिपरे उजाला टुडे कोंडागांव
बस्तर की साहित्यिक चेतना को राष्ट्रीय मंच पर सम्मान: हिंदी पत्रकारिता शताब्दी समारोह की राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करेंगे डॉ. राजाराम त्रिपाठी
‘बस्तर बोल रहा हूं’ के रचनाकार और ‘ककसाड़’ के संपादक डॉ. त्रिपाठी कोलकाता में ‘द्वि-शताब्दी हिंदी पत्रकारिता और बंगीय विरासत’ संगोष्ठी का करेंगे नेतृत्व; समूचे छत्तीसगढ़ में हर्ष की लहर।
उजाला टुडे कोंडागांव 06 जून 2026-कोंडागांव:हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली २०० वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर बस्तर के प्रख्यात साहित्यकार, चिंतक और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. राजाराम त्रिपाठी को एक बड़ी राष्ट्रीय जिम्मेदारी सौंपी गई है। आगामी ९ जून २०२६ को कोलकाता में आयोजित होने जा रही राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता का दायित्व डॉ. त्रिपाठी संभालेंगे। इस प्रतिष्ठित चयन से बस्तर सहित समूचे छत्तीसगढ़ के साहित्यिक, पत्रकारिता और बौद्धिक जगत में हर्ष और गौरव का वातावरण है।
द्वि-शताब्दी समारोह और मुख्य आकर्षण
भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता के सभागार में आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का मुख्य विषय “द्वि-शताब्दी हिंदी पत्रकारिता और बंगीय विरासत” रखा गया है। यह भव्य आयोजन हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की यात्रा (१८२६-२०२६) के उपलक्ष्य में देशभर के प्रमुख साहित्यकारों, पत्रकारों, संपादकों और चिंतकों को एक साझा मंच प्रदान कर रहा है।
इस गरिमामयी कार्यक्रम में:
- मुख्य अतिथि: वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘छपते-छपते’ के संपादक श्री विश्वम्भर नेवर होंगे।
- बीज वक्तव्य: सुप्रसिद्ध साहित्यकार, भारतीय भाषा परिषद के निदेशक व ‘वागर्थ’ के संपादक डॉ. शंभुनाथ देंगे।
- विशिष्ट अतिथि व वक्ता: राज मंगोलिया, शकुन त्रिवेदी, जितेन्द्र जितांशु, संतोष सिंह, शाहनवाज अख्तर तथा रेशमी पांडा मुखर्जी अपने विचार रखेंगे।
- मंच संचालन: डॉ. अभिज्ञात द्वारा किया जाएगा।
विशेष सम्मान: इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार श्री संतन कुमार पाण्डेय को ‘पैरोकार लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड’ तथा श्री गंगा प्रसाद को ‘पैरोकार पत्रकारिता शिखर सम्मान’ से नवाजा जाएगा। इस पूरे ऐतिहासिक आयोजन की कमान ‘पैरोकार’ पत्रिका के संपादक व संयोजक अनवर हुसैन अपनी टीम के साथ संभाल रहे हैं।
जनजातीय भारत की मुखर आवाज़ हैं डॉ. त्रिपाठी
साहित्यिक विश्लेषकों का मानना है कि डॉ. राजाराम त्रिपाठी का अध्यक्ष के रूप में चयन केवल एक संपादक का सम्मान नहीं है, बल्कि यह जनजातीय भारत की आवाज़ को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का एक सराहनीय प्रयास है।
१२ वर्षों का अनवरत सफर: डॉ. त्रिपाठी पिछले १२ वर्षों से जनजातीय सरोकारों की प्रतिष्ठित राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘ककसाड़’ का संपादन कर रहे हैं। इस पत्रिका ने आदिवासी समाज की संस्कृति, उनकी समस्याओं और संघर्षों को देश के सामने बेहद संजीदगी से प्रस्तुत किया है।
वैश्विक स्तर पर सराहा गया साहित्य
डॉ. त्रिपाठी की रचनाओं ने देश-विदेश में बस्तर की पहचान को मजबूत किया है:
- मैं बस्तर बोल रहा हूं: इस बहुचर्चित काव्य कृति की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसका अंग्रेजी अनुवाद “Yes, Bastar is Speaking” और मराठी अनुवाद “मी आदिवासी बोलतोय” (वरिष्ठ साहित्यकार संजय जगताप द्वारा) प्रकाशित हो चुका है, जिसे महाराष्ट्र में भी भारी सराहना मिली।
- दुनिया इन दिनों: उनके तीखे और विमर्शपूर्ण संपादकीय लेखों का यह संग्रह पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय है।
- गांडा अनुसूचित जाति या जनजाति?: हाल ही में प्रकाशित उनका यह शोधग्रंथ वर्तमान में अकादमिक और बौद्धिक जगत में सामाजिक न्याय व जनजातीय इतिहास को लेकर एक गंभीर हस्तक्षेप माना जा रहा है।
कृषि नवाचार और सामाजिक क्षेत्र में भी अनूठा योगदान
साहित्य और पत्रकारिता से इतर, डॉ. राजाराम त्रिपाठी जैविक कृषि, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में एक अंतरराष्ट्रीय नाम हैं। बस्तर में उच्च उत्पादकता वाली काली मिर्च की किस्मों के विकास, प्राकृतिक कृषि मॉडल और आदिवासी समुदायों के आजीविका संवर्धन (Livelihood Promotion) के लिए उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई विशिष्ट सम्मान मिल चुके हैं।
कोलकाता में होने वाला यह द्वि-शताब्दी आयोजन निश्चित रूप से भारतीय भाषाओं और पत्रकारिता के अंतर्संबंधों को मजबूत करेगा, जहां बस्तर की साहित्यिक चेतना और जनजातीय संवेदना की गूंज पूरे देश को सुनाई देगी।

