संपादक, संजय सोनपिपरे उजाला टुडे कोंडागांव
परंपराओं के पीछे छिपा है विज्ञान: शासकीय हाई स्कूल हात्मा में ‘प्रकृति और नवाचार’ के साथ मना भारतीय नववर्ष
उजाला टुडे कोंडागांव 19 मार्च 2026- कोंडागांव :बडेराजपुर हात्मा भारतीय नववर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) के अवसर पर शासकीय हाई स्कूल हात्मा में शिक्षा और संस्कृति का एक अनूठा संगम देखने को मिला। यहाँ नववर्ष को केवल पारंपरिक अनुष्ठान तक सीमित न रखकर ‘प्रकृति, विज्ञान और नवाचार के उत्सव’ के रूप में मनाया गया। इस नवाचारी पहल के माध्यम से विद्यार्थियों ने किताबी ज्ञान को धरातल पर उतरते देखा और समझा कि कैसे भारतीय परंपराएं वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं।
खेतों और खलिहानों में सजी ‘खुली क्लास’
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ‘प्रकृति अन्वेषण यात्रा’ रही। बच्चों को क्लासरूम की चारदीवारी से निकालकर सीधे खेतों और बगीचों में ले जाया गया। यहाँ आम, महुआ, नीम, इमली और पलाश (फरसा) जैसे स्थानीय वृक्षों के बीच शिक्षकों ने औषधीय विज्ञान की बारीकियां समझाईं। विद्यार्थियों ने सीखा कि ऋतु परिवर्तन के समय ये पेड़ किस तरह हमारे इकोसिस्टम को संतुलित रखते हैं और स्वास्थ्य के लिए ‘संजीवनी’ का काम करते हैं।
प्रायोगिक गतिविधियों से वैज्ञानिक समझ का विकास
स्कूल परिसर में आयोजित गतिविधियों के माध्यम से बच्चों ने कई वैज्ञानिक प्रयोग किए:
- नेचुरल एयर फिल्टर (तोरण निर्माण): आम और नीम के पत्तों का तोरण बनाते समय बच्चों को बताया गया कि यह केवल सजावट नहीं, बल्कि बैक्टीरिया रोधी प्राकृतिक फिल्टर है जो हवा को शुद्ध करता है।
- रसायन विज्ञान और प्राकृतिक रंग: कैंपस वॉक के दौरान टेसू (पलाश) के फूलों से प्राकृतिक रंग बनाने की विधि सीखी गई, जो रसायनों के सुरक्षित विकल्प के रूप में रसायन विज्ञान का व्यावहारिक उदाहरण है।
- खगोल विज्ञान और छाया मापन: सूर्य की स्थिति और पृथ्वी की गति को समझने के लिए विद्यार्थियों ने ‘शैडो ट्रैकिंग’ (छाया मापन) की, जिससे उन्हें दिन के विभिन्न प्रहरों का खगोलीय आधार समझ आया।
सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता और उत्साह
दिन भर की गतिविधियों के बाद अर्जित ज्ञान के परीक्षण हेतु एक क्विज़ प्रतियोगिता आयोजित की गई। इसमें औषधीय पौधों, खगोलीय आधार और पर्यावरण से जुड़े प्रश्न पूछे गए, जिसमें बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
“यह आयोजन बच्चों में वैज्ञानिक सोच (Scientific Temper) विकसित करने और उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ने का एक सफल प्रयास है। खेल-खेल में सीखने के इस तरीके से बच्चे पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील बनेंगे।”
— संदीप सेन, व्याख्याता
इस आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि जब शिक्षा को परंपरा और प्रकृति से जोड़ा जाता है, तो सीखना अधिक स्थायी और आनंददायक हो जाता है।

