संपादक, संजय सोनपिपरे उजाला टुडे कोंडागांव
विशेष रिपोर्ट: छोटे किसानों के लिए ‘फांस’ बनी ट्रैक्टरों की होड़, कर्ज और डीजल के बोझ ने तोड़ी कमर
आईफा (AIFA) संयोजक डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने नीतिगत बदलावों की उठाई मांग; कहा- “छोटे खेतों के लिए पावर टिलर ही एकमात्र व्यावहारिक समाधान।”
उजाला टुडे कोंडागांव 24 अप्रैल 2026-:भारतीय कृषि में मशीनीकरण को अक्सर सफलता की गारंटी माना जाता है, लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह ‘सौदा’ अब घाटे का बनता जा रहा है। अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने देश के कृषि संकट के एक नए पहलू को उजागर करते हुए कहा है कि बिना सोचे-समझे किया गया मशीनीकरण और ट्रैक्टरों का बढ़ता उपयोग छोटे किसानों को आर्थिक बदहाली की ओर धकेल रहा है।
दिखावे की संस्कृति और आर्थिक दबाव
डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, देश के अधिकांश हिस्सों में ट्रैक्टर अब जरूरत से ज्यादा ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ का विषय बन गया है। 2 से 4 एकड़ की जोत रखने वाले किसान भी भारी-भरकम और ऊंचे हॉर्सपावर वाले ट्रैक्टर खरीद रहे हैं। इस बेमेल मशीनीकरण का सीधा असर किसान की जेब पर पड़ रहा है। ट्रैक्टर की महंगी किश्तें (EMI) और बैंकों का ब्याज किसान को उस कर्ज के जाल में फंसा देता है, जिससे बाहर निकलना उसके लिए नामुमकिन हो जाता है।
डीजल की खपत और बढ़ती लागत
एक तरफ जहाँ किसान को अपनी उपज का सही मूल्य पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ बड़े ट्रैक्टरों में होने वाली भारी डीजल खपत उसकी उत्पादन लागत को कई गुना बढ़ा देती है। डॉ. त्रिपाठी, जो भारतीय गुणवत्ता संस्थान (BIS) के सदस्य भी हैं, बताते हैं कि छोटे खेतों में बड़े ट्रैक्टर न केवल अनुत्पादक हैं, बल्कि वे ईंधन की बर्बादी भी करते हैं। इसके साथ ही, अकुशल संचालन और छोटे खेतों की बनावट के कारण ट्रैक्टर दुर्घटनाओं का जोखिम भी लगातार बढ़ रहा है, जो कई बार जानलेवा साबित होता है।
नीतियों की बेड़ियां और पावर टिलर का विकल्प
इस संकट का सबसे प्रभावी समाधान ‘पावर टिलर’ जैसे छोटे और किफायती उपकरण हो सकते हैं। डॉ. त्रिपाठी का कहना है कि पावर टिलर छोटे खेतों के लिए तकनीकी और आर्थिक दोनों रूप से फिट बैठते हैं, लेकिन सरकारी नीतियों की सीमाएं और जटिल मानक इनके विस्तार में बड़ी बाधा बने हुए हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक सरकार पावर टिलर जैसे सस्ते विकल्पों पर लगी नीतिगत पाबंदियों को नहीं हटाती और इन्हें छोटे किसानों के लिए सुलभ नहीं बनाती, तब तक किसान ‘बड़े ट्रैक्टरों के बोझ’ तले दबता रहेगा।
विशेषज्ञ का सुझाव: बदलनी होगी सोच
डॉ. त्रिपाठी ने नीति-निर्माताओं को सुझाव दिया है कि कृषि विकास का पैमाना बड़ी मशीनों की बिक्री नहीं, बल्कि किसान की ‘शुद्ध बचत’ होनी चाहिए। उन्होंने ‘कस्टम हायरिंग सेंटर्स’ (किराये पर मशीनरी) को बढ़ावा देने और छोटे कृषि यंत्रों पर विशेष ध्यान देने की वकालत की है, ताकि खेती को फिर से मुनाफे का जरिया बनाया जा सके।
