उजाला टुडे संवाददाता:- संजय सोनपिपरे कोंडागांव
छत्तीसगढ़ में स्कूल बंद, दारू दुकानें आबाद: शिक्षा बनाम शराब का बवाल और 21 शिक्षक संगठनों का एकजुट विरोध
छत्तीसगढ़ में शिक्षा के भविष्य को लेकर एक गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। सरकार की लगभग 4000 सरकारी स्कूलों को बंद करने की योजना ने शिक्षकों, छात्र संगठनों और आम जनता के बीच भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। इस कदम को “युक्तिकरण” (rationalization) का नाम दिया जा रहा है, जिसका सीधा अर्थ है कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को बंद करना या उनका विलय करना। लेकिन, असल सवाल यह है कि आखिर ये स्कूल बंद करके सरकार क्या खोलना चाहती है? आरोप लग रहे हैं कि शिक्षा के मंदिर बंद करके शराब दुकानों की संख्या बढ़ाई जा रही है, जिससे युवा पीढ़ी का भविष्य दांव पर लग रहा है।
21 शिक्षक संगठनों की एकजुटता और शासन को ज्ञापन
इस जनविरोधी फैसले के खिलाफ 21 विभिन्न शिक्षक संगठन एकजुट हो गए हैं। इन सभी संगठनों ने मिलकर शासन को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है, जिसमें स्कूल बंद करने की योजना को तत्काल रद्द करने की मांग की गई है। इस एकजुटता ने सरकार पर दबाव बढ़ाया है और साफ कर दिया है कि यह एक जन आंदोलन का रूप ले रहा है।
शिक्षकों और छात्र संगठनों का करारा जवाब
शिक्षक संगठन और एनएसयूआई (NSUI) जैसे छात्र संगठन इस फैसले के खिलाफ मजबूती से खड़े हैं। उनका सीधा आरोप है कि यह कदम शिक्षा के निजीकरण और भगवाकरण की ओर एक बड़ा इशारा है। वे तर्क दे रहे हैं कि:
* शिक्षा से वंचित होंगे बच्चे: हजारों गरीब बच्चे, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियां, शिक्षा से वंचित हो जाएंगी। दूर के स्कूलों में जाना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
* रोजगार का संकट: स्कूलों के बंद होने से सिर्फ बच्चे ही प्रभावित नहीं होंगे, बल्कि मध्याह्न भोजन बनाने वाले और साफ-सफाई करने वाले कर्मचारी भी बेरोजगार हो जाएंगे, जो पहले से ही न्यूनतम मजदूरी पर काम करते हैं।
* सरकार की नीयत पर सवाल: जब शिक्षा की बात आती है, तो सरकार के पास “फंड नहीं है” का रोना रोया जाता है, लेकिन शराब दुकानों के लिए पैसे की कोई कमी नहीं होती। यह दिखाता है कि सरकार की प्राथमिकताएं कितनी बदली हुई हैं।
* पहले भी हुआ ऐसा: यह पहली बार नहीं है। पिछली भाजपा सरकार ने भी “युक्तिकरण” के नाम पर 2,000 से अधिक स्कूलों को बंद कर दिया था, जिसके दूरगामी परिणाम हुए थे।
शराब दुकानों का जाल और बिगड़ता भविष्य
विरोध प्रदर्शनों में एक बड़ा आरोप यह भी लग रहा है कि एक तरफ स्कूल बंद हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ शराब दुकानों का जाल बिछाया जा रहा है। एनएसयूआई जैसे संगठन खुले तौर पर कह रहे हैं कि सरकार शिक्षा को दरकिनार कर शराब को बढ़ावा दे रही है। उनका तर्क है कि:
* सामाजिक बुराई: शराब की बढ़ती दुकानें समाज में कई बुराइयां लेकर आती हैं, खासकर युवाओं को नशे की गिरफ्त में धकेलती हैं।
* स्वास्थ्य और सुरक्षा पर असर: शराब के सेवन से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ती हैं और अपराधों में भी वृद्धि होती है, जिससे समाज में असुरक्षा का माहौल बनता है।
* विकास पर सवाल: क्या किसी राज्य का विकास शराब की दुकानों की संख्या बढ़ाकर हो सकता है? यह एक बड़ा सवाल है जो सरकार के विजन पर संदेह पैदा करता है।
फिलहाल रुका है बवाल, पर जंग जारी है
शिक्षकों के संगठनों के कड़े विरोध के बाद, छत्तीसगढ़ सरकार ने फिलहाल इस “युक्तिकरण” अभियान को रोक दिया है। यह 21 शिक्षक संगठनों की एकजुटता और उनके दबाव का ही परिणाम है। यह एक छोटी जीत है, लेकिन लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। नई शिक्षा नीति की आड़ में शिक्षा के निजीकरण और भगवाकरण के व्यापक एजेंडे के खिलाफ यह जंग जारी है।
इस पूरे प्रकरण में एक बात स्पष्ट है: छत्तीसगढ़ की जनता अपने बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। क्या सरकार शिक्षा को प्राथमिकता देगी, या शराब के रास्ते पर चलती रहेगी?
