संजय सोनपिपरे उजाला टुडे कोंडागांव

सोढ़ी ने उस विडंबना पर करारा प्रहार किया है, जहां एक गरीब ग्रामीण एक लकड़ी काट ले तो वन विभाग उसे जेल भेजने पर तुला रहता है, लेकिन जब पूरा का पूरा डामर प्लांट वन भूमि पर अवैध रूप से उग आता है, तो ‘अंधेरगर्दी’ छा जाती है। वन विभाग ने नोटिस दिया, चेतावनी दी, लेकिन 10 दिन बाद भी प्लांट वहीं खड़ा रहा, बल्कि दोगुने जोश से चलने लगा। क्या यह ‘अंधेरगर्दी’ बिना किसी ‘ऊपर’ के आशीर्वाद के संभव है?
पूर्व मंत्री ने वन मंत्री केदार कश्यप को सीधे कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा है कि क्या उन्हें अपने ही विभाग पर कोई नियंत्रण नहीं है? क्या नियमों की किताबें सिर्फ गरीबों और आम जनता को डराने के लिए बनी हैं? पर्यावरण की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, और प्रशासन का ‘डर’ जैसे हवा में उड़ गया है।
शंकर सोढ़ी ने स्पष्ट कहा है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन “जंगल को उजाड़कर और नियमों को रौंदकर किया गया विकास” उन्हें मंजूर नहीं है। यह सिर्फ एक डामर प्लांट का मामला नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ में बढ़ते ‘अवैधता के साम्राज्य’ का एक छोटा सा नमूना है। क्या वन मंत्री केदार कश्यप इस ‘डामर-राज’ को खत्म कर पाएंगे, या कोंडागांव का जंगल ऐसे ही ‘रसूखदारों की भेंट’ चढ़ता रहेगा? सवाल बड़ा है, और जवाब का इंतजार कोंडागांव की जनता कर रही है।

क्या आपको लगता है कि इस मामले में न्यायिक जांच होनी चाहिए ताकि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो सके?
