संजय सोनपिपरे संपादक, उजाला टुडे कोंडागांव
सवाल: कोंडागांव के नक्सल मुक्त होने के बावजूद क्यों हो रहे हैं आत्मसमर्पण?
उजाला टुडे कोंडागांव, छत्तीसगढ़ – 19 अगस्त 2025: हाल ही में, जब कोंडागांव जैसे कई जिलों को वामपंथी उग्रवाद (LWE) प्रभावित सूची से बाहर कर दिया गया है, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर क्यों आज भी यहाँ नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं? क्या “नक्सल मुक्त” होने का दावा सिर्फ कागजों पर है, या इसके पीछे कोई और कहानी है?
”नक्सल मुक्त” का दावा, पर ज़मीनी हकीकत क्या?
प्रशासन और सरकार अक्सर बड़े-बड़े दावे करती है कि अमुक क्षेत्र को नक्सल मुक्त कर दिया गया है। कोंडागांव भी उन्हीं में से एक है, जहाँ नक्सली गतिविधियों में कमी आने के बाद इसे “नक्सल मुक्त” क्षेत्रों में गिना जाने लगा है। लेकिन अगर क्षेत्र सचमुच पूरी तरह नक्सल मुक्त हो गया है, तो फिर आज भी इनामी नक्सलियों का आत्मसमर्पण क्यों हो रहा है, जैसा कि आज चार नक्सलियों के समर्पण से सामने आया है? क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं कि क्षेत्र में नक्सली जड़ें अभी भी पूरी तरह उखाड़ी नहीं जा सकी हैं?
दबाव या कमजोरी: क्या है आत्मसमर्पण की असली वजह?
सुरक्षा बल लगातार यह तर्क देते हैं कि उनके बढ़ते दबाव, नक्सलियों के भीतर बढ़ते आंतरिक मतभेद और कमजोर होती पकड़ के कारण नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं। यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है कि नक्सली संगठन पहले से कमजोर हुए हैं। लेकिन क्या यह कमजोरी इतनी है कि उन्हें “नक्सल मुक्त” घोषित कर दिया जाए, जबकि उनके सदस्य अभी भी जंगलों में सक्रिय हैं और बाद में आत्मसमर्पण कर रहे हैं?
यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है कि क्या “नक्सल मुक्त” का दावा सिर्फ विकास कार्यों को गति देने और क्षेत्र में सामान्य स्थिति बहाल करने का एक प्रयास है, ताकि निवेशक और अन्य परियोजनाएं आसानी से आ सकें? यदि ऐसा है, तो यह समझना होगा कि घोषणाओं और जमीनी हकीकत में फर्क होता है।
नीति की सफलता या शेष बचे समूहों का अंत?
सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति बेशक सराहनीय है, जो नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटने का अवसर देती है। लेकिन जब एक जिले को “नक्सल मुक्त” घोषित कर दिया जाता है, तो फिर इस नीति के तहत आत्मसमर्पण की आवश्यकता क्यों बनी रहती है? क्या इसका मतलब यह है कि अभी भी ऐसे छोटे-छोटे नक्सली समूह या व्यक्ति बचे हुए हैं जो सक्रिय हैं और जिन तक पहुँचने के लिए आत्मसमर्पण नीति ही एकमात्र रास्ता है?
या यह सिर्फ एक धीमी प्रक्रिया का हिस्सा है जहाँ बचे हुए आखिरी कुछ नक्सलियों को भी बाहर निकाला जा रहा है? यदि ऐसा है, तो “नक्सल मुक्त” घोषणा की परिभाषा और उसके निहितार्थ पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
निष्कर्ष:

