
संजय सोनपिपरे संपादक, उजाला टुडे कोंडागांव
🛑 विशेष रिपोर्ट: छत्तीसगढ़ का ‘अबूझ’ संघर्ष — विकास से कोसों दूर अबूझमाड़, जहाँ राशन भी मौत का दूसरा नाम
उजाला टुडे कोंडागांव 26 नवम्बर 2025- नारायणपुर छत्तीसगढ़: भारत के हृदय में बसा, छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ क्षेत्र, जिसे ‘अज्ञात पहाड़ियाँ’ भी कहा जाता है, आज भी आधुनिकता और मूलभूत नागरिक अधिकारों से कटा हुआ है। इस क्षेत्र के गाँवों में जीवनयापन, दैनिक संघर्ष की एक क्रूर गाथा है—एक ऐसी गाथा जहाँ राशन-सामान जुटाना भी एक जानलेवा अभियान बन चुका है।
🏞️ ‘नो मैन्स लैंड’ में जनजीवन
अबूझमाड़ के सैकड़ों गाँव आज भी बिजली के अँधेरे, पक्की सड़कों की सुविधा से शून्य और साफ पेयजल की कमी से जूझ रहे हैं। यह घोर अभाव, यहाँ के निवासियों को 21वीं सदी में भी अत्यंत जोखिम भरे जीवन के लिए मजबूर करता है।
👣 15 किमी का सफर: भूख-प्यास और जंगली डर
सबसे बड़ी त्रासदी खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर है। इन अंचलों में सरकारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) केंद्र या स्थानीय बाज़ार इतनी दूर स्थित हैं कि ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर पहुँचना पड़ता है।
- खतरनाक पगडंडियाँ: स्थानीय लोग 15 से 20 किलोमीटर की दूरी तक घने जंगल के बीच से गुजरती, ऊबड़-खाबड़, पथरीली पगडंडियों पर पैदल चलते हैं।
- पहाड़ की चढ़ाई-उतराई: यह यात्रा केवल लंबी नहीं, बल्कि खड़ी पहाड़ियों की खतरनाक चढ़ाई और उतराई से भरी होती है।
- डबल जोखिम: ग्रामीण भूखे-प्यासे इस सफर को पूरा करते हैं, केवल राशन लेने के लिए। वापसी में, वे इसी खतरनाक रास्ते पर 40-50 किलो तक का भारी गठर सिर पर और काँवड़ में ढोकर लाते हैं, जिससे गिरने या चोटिल होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
- जंगली जानवरों का डर: घने जंगल होने के कारण जंगली जानवरों का खतरा हमेशा बना रहता है, जिससे हर ग्रामीण डर के साए में जीता है।
🚨 स्वास्थ्य आपातकाल: बीमार होने पर ‘कोई नहीं आएगा’
बुनियादी परिवहन सुविधा न होने के कारण, यहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ पूरी तरह से ध्वस्त हैं।
- एम्बुलेंस शून्य: गाँव तक एम्बुलेंस या मेडिकल टीम का पहुँचना असंभव है।
- मानवीय परिवहन: आपात स्थिति में, बीमार या प्रसव पीड़ा से ग्रसित महिला को चारपाई या कपड़े के झूलों में डालकर कई किलोमीटर पैदल मुख्य सड़क तक ढोना पड़ता है—एक ऐसी प्रक्रिया जो अक्सर रास्ते में ही मरीज की जान ले लेती है।
📢 प्रशासन से सवाल: कब मिटेगा यह ‘अज्ञात’ अंधेरा?
अबूझमाड़ के आदिवासियों का जीवन अब सिर्फ ‘जीने की कला’ नहीं, बल्कि हर दिन की ‘मौत से जंग’ बन चुका है। प्रशासन को तत्काल प्राथमिकता के आधार पर कदम उठाने होंगे:
- राशन वितरण में सुधार: गांवों के निकट मिनी PDS केंद्र या मोबाइल राशन वाहन शुरू किए जाएं।
- स्वास्थ्य पहुँच: मोबाइल मेडिकल यूनिट्स को दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए विशेष रणनीति बनाई जाए।
- बुनियादी ढाँचा: सरकारी योजनाओं के तहत सर्व-मौसम सड़कों (All-Weather Roads) का निर्माण तेजी से पूरा किया जाए ताकि गाँव मुख्यधारा से जुड़ सकें।
यह क्षेत्र केवल वनोपज का खजाना नहीं है; यह उन लाखों नागरिकों का घर है जो आज भी अपने मूलभूत अधिकारों की प्रतीक्षा कर रहे हैं।


