संपादक, संजय सोनपिपरे उजाला टुडे कोंडागांव
कोलकाता में गूंजी बस्तर की आवाज़: डॉ. राजाराम त्रिपाठी को ‘पैरोकार ग्रामीण पत्रकारिता शिखर सम्मान’
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी की डॉ. त्रिपाठी ने की अध्यक्षता; अवार्ड को बस्तर के आदिवासियों और छत्तीसगढ़ के पत्रकारों को किया समर्पित
उजाला टुडे कोंडागांव 10 जून 2026- कोंडागांव /कोलकाता: हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर कोलकाता में एक भव्य और ऐतिहासिक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता तथा प्रतिष्ठित साहित्यिक शोध पत्रिका ‘पैरोकार’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस “हिंदी पत्रकारिता द्विशताब्दी समारोह (1826-2026)” में देश भर के दिग्गजों ने हिस्सा लिया।
इस गौरवशाली अवसर पर कृषि, किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर तीन दशकों से अधिक समय से सतत लेखन करने वाले बस्तर के प्रख्यात साहित्यकार, चिंतक व वरिष्ठ पत्रकार डॉ. राजाराम त्रिपाठी को ‘पैरोकार ग्रामीण पत्रकारिता शिखर सम्मान’ से अलंकृत किया गया। साथ ही उन्होंने इस गरिमामय राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता भी की।
बस्तर के आदिवासी समाज और पत्रकारों को समर्पित किया सम्मान
सम्मान ग्रहण करते हुए राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘ककसाड़’ के संपादक डॉ. राजाराम त्रिपाठी भावुक हो उठे। उन्होंने इस राष्ट्रीय सम्मान को बस्तर के आदिवासी समाज तथा बस्तर व छत्तीसगढ़ के पत्रकार समुदाय को समर्पित किया। डॉ. त्रिपाठी ने कहा:
”मैंने जीवन में जो कुछ भी सीखा है, उसमें जनजातीय समाज की जीवन-दृष्टि, प्रकृति के प्रति सम्मान, सामूहिक चेतना और मानवीय संवेदना का सबसे बड़ा योगदान है।”
“आज भी ज़िंदा है प्रेमचंद के गोदान का होरी”
”द्वि-शताब्दी हिंदी पत्रकारिता और बंगीय विरासत” विषय पर आयोजित संगोष्ठी में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन के दौरान डॉ. त्रिपाठी ने ग्रामीण भारत की उपेक्षा पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि देश की कृषि, किसानों और ग्रामीण जीवन को पत्रकारिता तथा साहित्य में वह स्थान नहीं मिल पाया है जिसके वे वास्तविक हकदार हैं। उन्होंने मार्मिक शब्दों में कहा, “प्रेमचंद के गोदान का होरी आज भी ज़िंदा है, और कर्ज में जकड़ा हुआ है।”
उन्होंने याद दिलाया कि हिंदी का प्रथम समाचार पत्र ‘उदंत मार्तंड’ 30 मई 1826 को कोलकाता की धरती से ही प्रकाशित हुआ था, जो भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत उदाहरण है।
‘व्यूज़ से न्यूज़’ निकालने के दौर पर तीखा कटाक्ष
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘छपते-छपते’ के संपादक श्री विश्वम्भर नेवर थे। वहीं, भारतीय भाषा परिषद के निदेशक व सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. शंभुनाथ ने बीज वक्तव्य देते हुए वर्तमान मीडिया पर तीखा कटाक्ष किया। उन्होंने कहा, “पहले न्यूज़ से न्यूज़ निकलता था, आज व्यूज़ से न्यूज़ निकाला जा रहा है। पत्रकारिता केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाजहित में आवश्यक सत्य को सामने लाना है।”
43 वर्षों का बेमिसाल पत्रकारिता सफर
उल्लेखनीय है कि डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने अपनी पत्रकारिता यात्रा 43 वर्ष पूर्व ‘बस्तर-टुडे’ साप्ताहिक समाचार पत्र से शुरू की थी। उनकी चर्चित कृति “मैं बस्तर बोल रहा हूं” (अंग्रेजी अनुवाद: Yes, Bastar is Speaking, मराठी: मी आदिवासी बोलतोय) देश भर में खासी लोकप्रिय रही है। इसके अलावा उनका शोधग्रंथ “गांडा : अनुसूचित जाति या जनजाति?” और संपादकीय संग्रह “दुनिया इन दिनों” भी बौद्धिक जगत में चर्चा का विषय हैं। साहित्य के साथ-साथ डॉ. त्रिपाठी को जैविक कृषि, पर्यावरण संरक्षण और कृषि नवाचार के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा चुका है।
इन दिग्गजों का भी हुआ सम्मान
इस भव्य समारोह में:
- श्री संतन कुमार पाण्डेय को ‘पैरोकार लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड’ से नवाजा गया।
- श्री गंगा प्रसाद को ‘पैरोकार पत्रकारिता शिखर सम्मान’ प्रदान किया गया।
कार्यक्रम का प्रभावशाली संचालन डॉ. अभिज्ञात ने किया। इस सफल आयोजन में पैरोकार के प्रधान संपादक अनवर हुसैन, विमल शर्मा और उनकी टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। संगोष्ठी में राज मंगोलिया, शकुन त्रिवेदी, जितेन्द्र जितांशु, संतोष सिंह, शाहनवाज अख्तर तथा रेशमी पांडा मुखर्जी जैसी जानी-मानी हस्तियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
बौद्धिक जगत का मानना है कि डॉ. त्रिपाठी को यह सम्मान मिलना दरअसल उस वैचारिक परंपरा का सम्मान है, जो खेत, खलिहान और आदिवासी समाज को देश के मुख्य विमर्श में लाने के लिए संघर्ष कर रही है।




